गांव / शहर

यह कविता मैंने तब लिखी जब मुझे पुणे आ कर शायद 8 या 10 साल हो गए थे। रोज की भाग दौड़ और जिंदगी को तेजी से गुजरते देख एक दिन अपने गांव “बैतूल” जो की एक छोटा शहर है की याद आ गयी। खास कर मेरे बचपन का वक्त, अब उस समय को याद करता हूँ तो लगता है जैसे किसी दूसरी दुनिया की बात होगी। क्योंकि बड़े शहरों में गावों के दृश्य बहुत कम ही देखने को मिलते है। ये कविता लिखते समय मुझे ऐसा लगा जैसे मैं उस समय में एक बार जा कर आया हूँ। और मुझे ये अहसास हुआ की अगर जिंदगी में कुछ समय निकाले और अपनी यादो के साथ उस समय को बिताएं तो हम जिंदगी में एक ठहराओ महसूस करते हैं। आप भी कभी कुछ समय निकालिये और अपने जीवन के सुनहरे दिनों में जरा घूम के आईये और इस कविता का आनंद लीजिये, और पसंद आये तो एक लाइक जरूर करें और कमेंट करे की आपको क्या महसूस हुआ।

खूबसूरत शहरों की कशिश में गांव सूना हो गया,
एक बार जो शहर गया, वो शहर का हो गया।।

गांव की एक ही है शक़्ल, सुकून और सादगी की,
शाम होते, ये चेहरा शहर का औऱ रंगीन हो गया।।

पगडंडियों पर चलती हुई पहचानी सी शक्लें हैं,
भीड़ में शहर की,  हर शख्स जैसे खो गया ।।

सांझ ढलते सुनहरी किरणें खेलती अमराइयों में,
शहरों का सूरज काले धुंए की चादरों में सो गया।।

आया यहाँ मैं सपनों को लेकर मंज़िलो की तलाश में,
मैं तो रहा शहर में, “मन” मेरा गांव में ही रह गया।।

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