‘नन्ही बेटी’

बेटियां घर के घर होने का एहसास करातीं हैं। बेटियों के होने से घर में एक ऊर्जा का प्रवाह रहता है। मेरी बेटी जब 4 साल की थी तब उसके और मेरे बीच में होने वाली बातों को इस कविता में पिरोया है, अपनी बेटी के बचपन और उसकी बातों को याद कर के एक बार इन पंक्तियों पर नजर दौड़ाइए और महसूस कीजिये जीवन की छोटी छोटी बातों में जो भावनाएं होती है, जीवन इन्ही भावनाओ और एहसासो का एक गुलदस्ता है। एक पिता और बेटी के बीच का ये संवाद अगर आप के ह्रदय को छूता है तो एक लाइक करें और अपने विचार कमेंट बॉक्स में शेयर करें।

कुछ सवाल, कुछ फरमाइशें यूँ दिन गुजरता है मेरा, नन्ही सी बेटी है मेरी, और वो सब जहान है मेरा।

भाषा तुतली है लेकिन, बात बहुत जरूरी है, गुड़िया तो लाना ही है, पर चॉकलेट भी जरूरी है,

टैडी जो बीमार हो गया, डॉक्टर किट भी लानी है, साइकिल की बास्केट है टूटी, वो भी नई लगानी है,

चिड़िया को देखा है उड़ते, पंखों से ही उड़ती है, वैसे पंख मुझे भी ला दो, बिटिया रानी कहती है,

पापा कितना काम हो करते, ये सवाल भी होता है, पैसे के कारण बोलूं , तो जवाब में गुल्लक होता है,

दुनियां का तो पता नहीं, पर मेरी अनुभूती कहती है, पापा होते बेटी की दुनियां, बेटी, पापा का जीवन होती है.

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